Project Method परिभाषाएँ, सोपान,सिद्धान्त, गुण, दोष 2022

Project Method ( योजना विधि ) विधि के जन्मदाता डब्ल्यू० एच० किलपैट्रिक हैं यह विधि जॉन डीवी (John Dewey) के शिक्षा सम्बन्धी मत तथा समस्या विधि के स्वाभाविक विकास से विकसित हुई।

प्रयोजना विधि की परिभाषाएँ  (Definition of project method)

किलपैट्रिक के अनुसार-

“योजना वह सहृदय सौद्देश्य कार्य-विधि है, जो पूर्णतः मन लगाकर लगन के साथ सामाजिक वातावरण में पूरी की जाती है।”

हन्टर के अनुसार-

“योजना विधि को इसलिये जन्म दिया गया है, जिससे कि विद्यार्थियों को वास्तविक शिक्षा मिल सके, वे सक्रिय होकर विषय का ज्ञान प्राप्त कर सकें। उन्हें चिन्तन एवं तर्क करने का अवसर प्राप्त हो सके। उनका पाठ्यक्रम उनकी रुचियों, अभिरुचियों तथा आवश्यकताओं पर निर्धारित हो सके तथा सामाजिक दृष्टिकोण के आधार पर शिक्षा प्रदान की जा सके। “

पार्कर के अनुसार-

’’प्रोजेक्ट कार्य की एक इकाई है, जिसमें छात्रों को कार्य की योजना और सम्पन्नता के लिए उत्तरदायी बनाया जाता है।’’

बेलार्ड के अनुसार-

“प्रोजेक्ट यथार्थ जीवन का एक ही भाग है जो विद्यालय में प्रयोग किया जाता है।’’

स्टीवेन्सन के अनुसार-

’’ प्रोजेक्ट एक समस्यामूलक कार्य है, जो स्वाभाविक स्थिति में पूरा किया जाता है।’’

थॉमस और लैंग के अनुसार – “

“प्रोजेक्ट इच्छानुसार किया जाने वाला ऐसा कार्य है, जिसमें रचनात्मक प्रयास अथवा विचार हो और जिसका कुछ सकारात्मक परिणाम भी हो।”

प्रोजेक्ट को बनाने के लिए सोपान ( Steps Of Making Project )

Project Method
Project Method
  1. परिस्थिति उत्पन्न करना
  2. प्रायोजना कार्य का चुनाव
  3. कार्यक्रम बनाना
  4. कार्यक्रम क्रियान्वित करना
  5. कार्य का मूल्यांकन करना
  6. कार्य का लेखा-जोखा रखना

किसी भी विषय से संबंधित प्रोजेक्ट को बनाने के लिए क्रमानुसार निम्नलिखित सोपानो या विधियों का प्रयोग किया जाता है।

  1. परिस्थिति प्रदान करना – किसी समस्या के समाधान को खोजने के लिए अनुकूल परिस्थितियों का होना अति आवश्यक है। इसी प्रकार योजना बनाते समय अध्यापक द्वारा छात्रों को अनुकूल परिस्थिति प्रदान की जाती है। अध्यापक छात्रों की योग्यता को ध्यान में रखते हुए समस्या के प्रति उनकी रुचि उत्पन्न करने में सहायक होता है।
  2. प्रायोजना कार्य का चुनाव (योजना के उद्देश्य एवं चयन )– योजना के उपयुक्त विषय का चयन सफलता में काफी सहायक होता है। अध्यापक द्वारा छात्रों की सूची योग्यता एवं परिस्थिति के अनुरूप योजना के उद्देश्यों का चयन करना चाहिए।
  3. कार्यक्रम बनाना (योजना बनाना) – अध्यापक द्वारा विषय के उद्देश्यों का चयन करने के उपरांत संपूर्ण कार्य की योजना बना लेना चाहिए तथा इसको क्रियान्वयन के लिए छात्रों में सामूहिक और व्यक्तिगत रूप से वितरित कर देना चाहिए।
  4.  कार्यक्रम क्रियान्वित करना  (क्रियान्वयन )– अध्यापक को छात्रों का मार्गदर्शन करते हुए योजना के विभिन्न चरणों को पूर्ण करने के लिए छात्रों को उत्तरदाई बनाना चाहिए तथा समय से समस्या के विभिन्न पहलुओं का क्रियान्वयन होना चाहिए।
  5.  कार्य का मूल्यांकन करना (मूल्यांकन )– प्रोजेक्ट का यह एक महत्वपूर्ण पद है इसमें संपूर्ण कार्य पूर्ण हो जाने पर उसे विभिन्न तथ्यों का उद्देश्य के अनुसार मूल्यांकन किया जाता है और इसके आधार पर समस्या के समाधान के रूप में निष्कर्ष को प्रस्तुत करते हैं।
  6.  कार्य का लेखा-जोखा रखना  (रिकॉर्डिंग )– प्रत्येक छात्र को जो कार्य दिया जाता है उससे संबंधित संपूर्ण तथ्यों को सुरक्षित रखने की विधि रिकॉर्डिंग कहलाती है। जब अध्यापक द्वारा निरीक्षण किया जाता है उस समय प्रोजेक्ट से संबंधित लेखा-जोखा प्रस्तुत किया जाता है। ऐसे में संपूर्ण योजना का एक पूरा विवरण सुरक्षित रखा जाता है।

किलपैट्रिक के अनुसार प्रोजेक्ट विधि के प्रकार ( Types Of Project Method According to killpetrik )

किलपैट्रिक के अनुसार प्रोजेक्ट विधि के चार प्रकार है।

  1. रचनात्मक प्रोजरक्ट- रचनात्मक प्रोजेक्ट का मुख्य उद्देश्य छात्रों के अन्दर रचनात्मक प्रवृत्ति का विकास करना होता है।  रचनात्मक प्रोजेक्ट के अन्तर्गत छात्र विभिन्न रचनाओं जैसे-मकान बनाना, नाव का निर्माण करना, पत्र लिखना आदि कार्य करते है।
  2. समस्यात्मक प्रोजेक्ट – समस्यात्मक प्रोजेक्ट का मुख्य उद्देश्य बौद्धिक समस्याओं को हल करने के लिये छात्रों को प्रेरित करना होता है।  जिसके अन्तर्गत शिक्षक छात्रों के समछ समस्याएँ रखते है और छात्र उन समस्याओं का निवारण करने का प्रयास करते है
  3. रसास्वादन के प्रोजेक्ट-रसास्वादन प्रोजेक्ट का मुख्य उद्देश्य छात्रों में रसानुभूति का विकास करना है।
  4. अभ्यास के प्रोजेक्ट- अभ्यास के प्रोजेक्ट विधि का मुख्य उद्देश्य छात्रों में इस बात का पता लगाना होता है की छात्र ने किस सीमा तक ज्ञान को ग्रहण किया है।

योजना विधि के सिद्धान्त (Principles of Project Method)

  1. प्रयोजनता- इसमें शिक्षक छात्र के सम्मुख प्रयोजनयुक्त कार्य प्रस्तुत करता है।
  2. क्रियशीलता प्रोजेक्ट प्रणाली के इस सिद्धांत के अन्तर्गत छात्र जो भी सीखता है वह करके सीखता है इसमें करके सीखने का सिद्धान्त प्रयोग में लाया जाता है।
  3. यथार्थता– छात्र को दिये जाने वाले समस्यात्मक कार्य ऐसे हो जो उसके वास्तविक जीवन से सम्बन्धित हो जिनका हल वह आसानी से निकाल लेते है।
  4. उपयोगिता-किसी भी प्रोजेक्ट का उपयोगी होना अति आवश्यक है। प्रोजेक्ट के उपयोगी होने का प्रमुख कारण उपयोगी कार्यों में छात्र अधिक रूचि लेते है
  5. रोचकता – इस विधि में छात्रों के सामने रुचिपूर्ण समस्याएँ उत्पन्न की जाती है।  जिससे छात्र उनमे अधिक रूचि लेते है
  6. स्वतन्त्रता- प्रोजेक्ट प्रणाली के इस सिद्धांत में छात्रों को स्वम अपना कार्य चुनने की स्वतंत्रता प्रदान की जाती है
  7. सामाजिकता- इस सिद्धांत में छात्रों को ऐसे अवसर दिये जाते है जिनसे उनमे सामाजिकता का विकास हो।

योजना विधि के गुण (Advantage Of Project Method )

1. विद्यार्थी समस्या के समाधान के लिये स्वयं ही चिन्तन करते हैं तथा विभिन्न पक्षों के बीच कार्य-कारण का सम्बन्ध स्थापित करने के प्रयास करते हैं, जिससे उनका मानसिक रूप से विकास होने की सम्भावना बढ़ती है।

2. इस विधि में पाठशाला का घर तथा समाज के साथ सजीव सम्पर्क बन जाता है, क्योंकि विद्यालय से प्राप्त ज्ञान घर तथा समाज की परिस्थितियों के समरूप ही होता है।

3. यह विधि मनोवैज्ञानिक आधारों पर आधारित होती है। इस विधि में अधिगम सिद्धान्त व व्यक्तिगत भिन्नता तथा विद्यार्थी की योग्यता, रुचि तथा प्रकृति आदि का ध्यान रखा जाता है।

4. सभी विद्यार्थियों को अपनी योग्यता एवं रुचि के अनुसार कार्य करने का अवसर प्राप्त होता है, इसलिये कोई भी विद्यार्थी उपेक्षित अनुभव नहीं करता है।

5. योजना विधि में विद्यार्थी स्वयं मूल्यांकन करते हैं। साथ ही उन्हें आत्म-निर्भरता, आत्म-विश्वास तथा आत्म-प्रकाशन का अच्छा अवसर प्राप्त होता है।

6. सभी विद्यार्थी पाठ्यवस्तु को स्वाभाविक परिस्थितियों में सीखते हैं। इसलिये इस विधि से प्राप्त ज्ञान अधिक स्थायी होता है।

7. इस विधि के द्वारा विद्यार्थियों में परस्पर सहयोग तथा स्वस्थ स्पर्धा के आधार पर कार्य करने की आदत बन जाती है, जिससे उनमें सहिष्णुता तथा आत्म-अनुशासन के गुण विकसित होते हैं।

योजना विधि के दोष

1 . यह Project Method अन्य विधियों की अपेक्षा अधिक व्ययपूर्ण है।

2. इस Project Method में प्रयुक्त होने वाले साधन प्रायः समस्त विद्यालयों में उपलब्ध नहीं होते हैं, क्योंकि न तो इतने कुशल शिक्षक ही उपलब्ध हैं और न ही पाठ्य-पुस्तकें

3. इस Project Method में मूल्यांकन विधि का प्रयोग करना कठिन होता है।

4. इस Project Method में पाठ्य-वस्तु का चयन विभिन्न स्थानों से किया जाता है। अतः किसी भी विषय का क्रमबद्ध और गहन अध्ययन किया जाता है।

5. इस Project Method के द्वारा पाठ्यक्रम को एक व्यवस्थित रूप से समाप्त करना बहुत कठिन होता है।

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