राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा 2005 ( NCF 2005 )

 

NCF 2005 (National  Curriculum Framework) भारत में राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (NCERT) द्वारा प्रकाशित एक दस्तावेज है जो देश भर के स्कूलों में पाठ्यक्रम विकास के लिए दिशानिर्देशों की रूपरेखा तैयार करता है। इस रूपरेखा का उद्देश्य शिक्षण के बजाय सीखने पर ध्यान देने के साथ शिक्षा के लिए एक समग्र और लचीला दृष्टिकोण प्रदान करना है, और सीखने के कई तरीकों के उपयोग और शिक्षा में प्रौद्योगिकी के एकीकरण को प्रोत्साहित करना है। यह शिक्षा में स

NCF 2005

मावेश और समानता के महत्व पर भी जोर देता है और पाठ्यक्रम में स्थानीय रूप से प्रासंगिक और सांस्कृतिक रूप से उपयुक्त सामग्री के उपयोग को प्रोत्साहित करता है।

 राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा NCF 2005

 

  • वर्ष 2004 में प्रो यशपाल उनके नेतृत्व में यशपाल समिति का गठन किया गया इस समिति ने राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा बनाकर वर्ष 2005 में दी | इस समिति में 21 विभिन्न क्षेत्रों से सम्मिलित किए गए व्यक्ति एवं कार्य थे इसलिए थे इसलिए 21  फोकस समिति नाम दिया गया
  • यहां पाठ्यक्रम को लेकर curriculum शब्द का प्रयोग किया गया जो लेटिन भाषा की currere बना है का शाब्दिक अर्थ दौड़ का मैदान होता है
  • NCF-2005 जिन शब्दों से शुरू किया गया |शब्द रविंद्र नाथ टैगोर द्वारा रचित सभ्यता और प्रगति निबंध का एक धर्म है जिसके अनुसार एक अभिभावक को चाहिए कि वह अपने बालकों को सर्जनशील प्रतिभाशाली शिक्षकों के हाथ में दे ताकि उनका भविष्य सुरक्षित रहे

NCF 2005 मैं प्रस्तावित विचार

 

  • शिक्षा बिना बोझ के होनी चाहिए
  • सीखने में रखने की परंपरा को रखने की परंपरा को समाप्त किया जाए
  • विद्यालय ज्ञान को बाय वातावरण के ज्ञान से जोड़ा जाए
  • बालक को नागरिक बनाने संबंधित शिक्षा प्रदान की जाए
  • परीक्षा के भय को दूर करने के लिए स्थान पर मूल्यांकन मापन की व्यवस्था हो एवं व्यवहार के आधार पर कक्षा की उन्नति का उन्नति का निर्णय हो |
  • बाल केंद्रित शिक्षण विधियों का अधिकतम उपयोग किया जाए शिक्षण विधियों को NCF द्वारा ही परंपरागत शिक्षक केंद्रित केंद्रित के रूप में वर्णित किया गया
  • देश में प्राथमिक स्तर से त्रिभाषा सूत्र लागू हो
  1. प्रथम भाषा हिंदी
  2. दूसरी भाषा अंग्रेजी
  3. तृतीय भाषा स्थानीय भाषा
  • निष्पत्ति परीक्षण उपलब्धि परीक्षण की उचित व्यवस्था

निष्पत्ति उपलब्धि परीक्षण

 

जब तक शिक्षक शिक्षण कार्य करता है तो शिक्षण कार्य करने के बाद वह यह जानने का प्रयास करता है कि उसके बालकों को आवश्यक सीमा तक अधिगम हुआ या नहीं वह उपलब्धि परीक्षण का आयोजन करता है जिसके 3 सोपान होते हैं

  1. उपलब्धि परीक्षण
  2. निदानात्मक परीक्षण

सोपान

  1. उपलब्धि परीक्षण – जब तक शिक्षक शिक्षण कार्य पूरा करने के बाद अपने बालकों की जांच करते हुए यह देखना है कि चाहता है कि बालकों को सीमा अधिगम हुआ या नहीं तो उसके लिए आयोजित किए जाने वाले परीक्षण को उपलब्धि परीक्षण कथा कहते हैं तथा इस परीक्षण के द्वारा पहचाने गए बालक जिन्हें आवश्यक अधिगम नहीं हुआ समस्यात्मक बालक कहलाते हैं
  2. निदानात्मक परीक्षण – जब समस्यात्मक बालकों की पहचान हो जाती हैं या एक भी समस्यात्मक बालक मिल जाता तो उन बालकों के लिए निदानात्मक परीक्षण का आयोजन किया जाता है तथा उसके द्वारा उन कारणों का पता लगाया जाता है जिन कारणों से बालक समस्यात्मक हैं|
  3. उपचारात्मक शिक्षण – निदानात्मक परीक्षण के माध्यम से जब बालक की समस्या का पता लग जाता है तो समस्या के कारणों को दूर करते हुए बालक को दोबारा से पढ़ाया जाता है और आवश्यक सीमा तक अधिगम करवाने का प्रयास किया जाता है तो यह उपचारात्मक शिक्षण कहलाता है

नोट

यदि एक बालक समस्यात्मक प्राप्त नहीं होता तो आगे के परीक्षणों का आयोजन नहीं होता जबकि एक भी बालक होने पर आगे की परीक्षण अनिवार्य होते हैं तथा उपचारात्मक शिक्षण के दौरान उन बालकों को बैठाया जाता जिन्हें आवश्यक सीमा तक अधिगम हो चुका है

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1. निम्न में से कौन सा कथन सत्य नहीं है

  1. उपलब्धि परीक्षण होने का अर्थ है निदान आत्मक परीक्षण भीहोगा
  2. निदानात्मक परीक्षण हो रहा है उपलब्धि परीक्षण हुआ
  3. उपचारात्मक शिक्षण उपलब्धि परीक्षण का अंतिम परिणाम है
  4. निदानात्मक परीक्षण से प्राप्त कारणों को उपचारात्मक शिक्षण द्वारा समाप्त किया जाता है

उत्तर – (1)उपलब्धि परीक्षण होने का अर्थ है निदान आत्मक परीक्षण भी होगा

 

2. एक श्रेष्ठ शिक्षक वह होता है जो सबसे पहले उपचारात्मक शिक्षण कर लेता है ताकि अन्य परीक्षाओं में समय खराब ना हो यह कथन है

  1. सत्य
  2. असत्य
  3. कभी-कभी
  4. यहां शिक्षक के विवेक पर निर्भर है

उत्तर- असत्य

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